एक शब्द है जवाबदेही, जिसे गुजरात का
होने की वजह से मोदी अक्सर 'जवाबदारी' कहते हैं. इसी का एक पर्यायवाची शब्द
उत्तरदायित्व भी है.
आसान भाषा में इसका मतलब यह होता है कि जवाब देने का काम किसका है? रफ़ाल सौदा और उसमें अनिल अंबानी की नई-नवेली कंपनी की भूमिका को लेकर बहुत सारे सवाल उठ रहे हैं जिनकी सीधी 'जवाबदारी' नरेंद्र मोदी की है क्योंकि वे प्रधानमंत्री हैं और इस सौदे पर उन्होंने दस्तख़त किए हैं. साथ ही, इस डील को अंजाम तक पहुंचाने में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर या कैबिनेट की किसी भूमिका के कोई सुराग नहीं हैं.
यही वजह है कि सवाल पीएम मोदी से पूछे जा रहे हैं, लेकिन जवाब उनकी टीम के सदस्य दे रहे हैं, सवालों की शक्ल में या फिर फिकरे कसकर.
पीएम ने मध्य प्रदेश में राहुल गांधी के आरोपों को विदेशी साज़िश करार दिया, लेकिन जवाब तो दूर, रफ़ाल शब्द उनके मुंह से नहीं निकला. यह फिकरा ज़रूर निकला, "जितना कीचड़ उछालेंगे उतना कमल खिलेगा."ह कहने का कोई आधार या सबूत नहीं है कि कोई घोटाला हुआ है या किसी ने रिश्वत ली है, लेकिन यह पूरा मामला राजीव गांधी के कार्यकाल के बोफ़ोर्स घोटाले की तरह परत-दर-परत खुल रहा है.
बोफ़ोर्स मामले में भी यह साबित नहीं हो सका कि वह घोटाला था या राहुल गांधी के पिता ने रिश्वत ली थी.
'चोर' और 'ख़ानदानी चोर' के हो-हल्ले के बीच, न तो सही सवाल सुनाई दे रहे हैं, न ही कोई जवाब मिल रहा है.
सवाल भारत के राष्ट्रीय हितों, सुरक्षा, प्रधानमंत्री के दफ़्तर की गरिमा और पारदर्शिता से जुड़े हैं. मामले की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट के दो मंत्रियों और एक नामी वकील ने इसे 'घोर आपराधिक अनियमितता' बताते हुए, कई सवाल सवाल पूछे हैं.
ऐसे ही सवाल 1980 के दशक में राजीव गांधी से पूछे जा रहे थे, तब उनकी जो प्रतिक्रिया थी, वह बीजेपी के आज के रवैए से बहुत अलग नहीं है.
जैसे व्यक्तिगत तौर पर भ्रष्ट होने के आरोप नरेंद्र मोदी पर नहीं लगे हैं, एक ज़माने में राजीव गांधी को 'मिस्टर क्लीन' कहा जाता था. सबसे पहली प्रतिक्रिया तो यही थी कि गंगा जैसी पवित्र छवि वाले नेता पर ऐसे आरोप लगाने की हिम्मत कैसे हुई?
जिन लोगों की उम्र 45 से ऊपर है, उन्हें शायद याद होगा कि राजीव गांधी ने 1989 के चुनाव में बोफ़ोर्स सौदे पर सवाल उठाने वालों को 'विदेशी ताक़तों का मोहरा' कहा था. ये भी कहा गया था कि भारत तोप ख़रीदकर ताक़तवर न हो जाए इसलिए विपक्ष के 'देश विरोधी' लोग मनगढ़ंत आरोप लगा रहे हैं.
आज भी ऐसे ही सुर सुनाई दे रहे हैं. बीजेपी ने संयुक्त संसदीय जांच समिति के गठन से इनकार कर दिया है, ठीक ऐसा ही राजीव गांधी ने भी किया था, हालांकि बाद में उन्हें विपक्ष की इस मांग को मानना पड़ा था.
भारतीय वायु सेना की ज़रूरतों को देखते हुए, फ़्रांसीसी कंपनी डासो एविएशन से 126 विमान ख़रीदे जाने थे. 2012 से मनमोहन सिंह की सरकार से फ़्रांसीसी कंपनी की बातचीत चल रही थी, 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी यह सिलसिला चलता रहा. 2015 में डासो के प्रमुख एरिक ट्रेपिए ने कहा था कि "95 प्रतिशत बातें तय हो गई हैं और जल्दी ही काम शुरू होगा."
प्रधानमंत्री मोदी ने 10 अप्रैल 2015 को अपनी फ़्रांस यात्रा के दौरान 17 समझौतों पर दस्तख़त किए, जिनमें एक समझौता रफ़ाल विमान की ख़रीद का भी था. फ्रांसीसी कंपनी से ख़रीदे जाने वाले विमानों की संख्या 126 से घटकर अचानक 36 हो गई. सरकार ने अभी तक देश की संसद या मीडिया को नहीं बताया है कि इतना बड़ा बदलाव, कब, क्यों और कैसे हुआ? हले न सिर्फ़ 126 फ़ाइटर जेट ख़रीदे जाने थे बल्कि उनमें से 108 विमान भारत में टेक्नोलॉजी ट्रांसफ़र करार के तहत, बेंगलुरू में सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स (एचएएल) में बनाए जाने वाले थे लेकिन वह इरादा छोड़ दिया गया. सरकारी क्षेत्र की कंपनी एचएएल के पास लड़ाकू विमान बनाने का अच्छा-ख़ासा अनुभव है, टेक्नोलॉजी ट्रांसफ़र के तहत वहाँ पहले भी सैकड़ों जगुआर और सुखोई विमान बनाए गए हैं.
'मेक इन इंडिया' में रक्षा क्षेत्र पर ज़ोर देने की बात कही गई थी और यह उस दिशा में बहुत बड़ा कदम हो सकता था. लंबी प्रक्रिया को पूरा करके, वायु सेना की ज़रूरतों का आकलन करने के बाद ही तय किया गया था कि 126 विमानों की ज़रूरत होगी. क्या भारत की जनता को बताया नहीं जाना चाहिए कि वायु सेना की लड़ाकू विमानों की ज़रूरत कम कैसे हो गई और एचएएल को यह मौका क्यों नहीं दिया गया?
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